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भारत की जीवाश्म ईंधन सबसिडी 2 बिलियन डालर तक गिरी, फिर भी अक्षय उर्जा के लिए अकाल

भारत में अक्षय उर्जा के लिए दी जानेवाली सबसिडी में वित्त वर्ष 2016-2017 के बीच रिकार्ड 0.8 अमरिकी डालर की बढ़ोतरी हुई। फिर भी वित्त वर्ष 2017 के दौरान जिवाश्म ईंधन के लिए सरकार की ओर से दी जानेवाली कुल सबसिडी (8 बिलियन अमेरिकी डालर) अक्षय उर्जा को दी जानेवाली कुल सबसिडी (2.2 अमेरिकी डालर) के मुकाबले तीन गुना ज्यादा रही। वित्त वर्ष 2016-2017 के दौरान कोयले को दी जानेवाली सबसिडी बढ़कर 116 अमेरिकी डालर हो गई।

नई दिल्ली, 20 दिसम्बर 2018 : ईन्टरनेशनल ईन्स्टीट्युट ओफ सस्टेईनेबल डेवलपमेन्ट (IISD) और काउन्सिल ओन एनर्जी, एनवायर्नमेन्ट और वोटर (CEEW) के आज ही प्रकाशित हुए एक रिपोर्ट के मुताबिक भारत में उर्जा के लिए दी जानेवाली कुल सबसिडी वित्त वर्ष 2017 के दौरान 1,51,480 करोड़ रुपए (23 बिलियन अमेरिकी डालर) रही। ईस में वित्त वर्ष 2014 के बाद से 36 फिसदी की कमी आई।

इस के अलावा, भारत की जिवाश्म ईंधन को दी जानेवाली सबसिडी में भी 70 फिसदी की कमी देखने को मिली। यह वित्त वर्ष 2014 में 1,73,330 करोड़ रुपए (29 बिलियन अमेरिकी डालर) थी, जो की वित्त वर्ष 2017 में घटकर 52,980 करोड रुपए (8 बिलियन डालर) हो गई। वित्त वर्ष 2016 से 2017 के दौरान, जिवाश्म ईंधन को दी जानेवाली सबसिडी में 12,270 करोड़ रुपए (2 बिलियन अमेरिकी डालर) की कमी आई। इस कमी की दो वजह रही, एक तो वैश्विक बाजार में तेल की किंमतो में भारी गिरावट और दुसरी देश में पेट्रोल, डीजल, खाना पकाने की गेस और केरोसिन पर दी जानेवाली सबसिडी में सुधार करना।

दुसरी ओर अक्षय उर्जा के लिए दी जानेवाली सबसिडी में वित्त वर्ष 2014 के बाद से 6 गुना बढ़ोतरी हुई, जिस में वित्त वर्ष 2016 से 17 के दौरान सब से ज्यादा 5,770 करोड़ रुपए (0.8 बिलियन अमेरिकी डालर) की बढोतरी हुई। पिछले साल भारत में दी गई सबसिडी की व्यापक सूची का यह अद्यतन रिपोर्ट है।

“सबसिडी में बढता हिस्सा भारत के ऊर्जा क्षेत्र को ज्यादा स्वच्छ बनाने की ओर समर्पित है। इसके बावजूद, भारत में वित्त वर्ष 2017 में तेल, गेस और कोयले को दी गई सबसिडी की कुल लागत अक्षय उर्जा और ईलेक्ट्रिकल व्हिकल्स को दी गई सबसिडी से तीन गुना ज्यादा है। 2022 तक 175 GW अक्षय उर्जा के लक्ष्य और ग्रीन हाउस गेस के उत्सर्जन व वायु प्रदूषण में कमी लाने के लक्ष्य को हांसिल करने के लिए भारत सरकार को चाहिए की वह स्वच्छ उर्जा के क्षेत्रों को ज्यादा सबसिडी दे। वित्त वर्ष 2017 में अकेले कोयले को दी गई सबसिडी (15,900 करोड रुपए), अक्षय उर्जा को दी गई सबसिडी (15,000 करोड रुपए) के मुकाबले ज्यादा थी।” – विभूति गर्ग, IISD

“अस्थिर तेल बाजार की वजह से बजट में उपभोक्ता सबसिडी की व्यवस्था करने में एक जोखिम बना रहता है। उच्च आयात कीमतों की वजह से खाना पकाने के गेस ओर केरोसिन को दी जानेवाली सबसिडी के खर्च में बढ़ोतरी होती है। ईसी समय के दौरान गेसोलिन और डीजल के कर में कटौती करने का सीधा असर सरकार की आय पर होता है। अगर सार्वजनिक परिवहन, ईलेक्ट्रिक मोबिलीटी और बिजली के उत्पादन के बजाय अक्षय ऊर्जा को बढावा देने के लिए ठोस कदम उठाए जाएं तो आयात पर निर्भरता कम हो सकती है और लंबे समय के लिए सबसिडी का बोझ भी कम हो सकता है।” – अभिनव सोमन, CEEW

IISD-CEEW  रिपोर्ट के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 में कोयले की सबसिडी (खनन और बिजली उत्पादन) 15,990 करोड रुपए (2.4 अमेरिकी डालर) रही, यानी की वित्त वर्ष 2016-17 के दौरान 1,150 करोड रुपए (116 बिलियन डालर) की बढ़ोतरी की गई। वैसे पिछले तीन सालों की तुलना में अपेक्षाकृत भले ही छोटा हो लेकिन एक बदलाव जरूर देखने को मिला की कोयले को दी जानेवाली मदद या तो स्थिर रही है या फिर उस में कमी आई है। कोयले के क्षेत्र में दी जानेवाली सबसे ज्यादा सबसिडी कोयले से बिजली बनानेवाले संयंत्रो को कर में दी जानेवाली छूट थी।

“कोयले के क्षेत्र को वित्तिय सहायता भारत के ऊर्जा मिश्रण में जिवाश्म ईंधन के प्रोत्साहन को कम करता है। कोयले के क्षेत्र में ज्यादा निवेश देखा गया है और साथ ही कोयले का नकारात्मक प्रभाव मानवीय स्वास्थ्य और पर्यावरण पर होता है।” – विभूति गर्ग,IISD

वित्त वर्ष 2016-2017 के दौरान ईलेक्ट्रिक क्षेत्र को दी जानेवाली सबसिडी में सबसे ज्यादा बढ़ोतरी देखने को मिली है, जो की 20,800 करोड रुपए (3.3 अमेरिकी डालर) रही। इलेक्ट्रिक कंपनीयों को उपभोक्ता कीमतों को कम रखने में यह सबसिडी क्षतिपूर्ति का काम करती है और यह सबसिडी वित्त वर्ष 2017 में भारत में उर्जा क्षेत्र को दी गई सबसिडी (72,439 करोड रुपए और 11.2 बिलियन अमेरिकी डालर) का करीब आधा हिस्सा रही।

IISD-CEEW  रिपोर्ट में वित्त वर्ष 2018 में भारत में ऊर्जा क्षेत्र को दी जानेवाली सबसिडी में आए बदलाव को भी चिन्हित किया गया है। ईलेक्ट्रिक सबसिडी सब से ज्यादा करीब 81,000 करोड़ रुपए (12.5 बिलियन डालर) है। गुड्स एन्ड सर्विस टेक्स (GST) में सुधार की वजह से कोयले और अक्षय ऊर्जा को दी जानेवाली कर छूट में 2,000 करोड रुपए (310 मिलियन अमरिकी डालर) की कमी देखने को मिली है। वैसे कोयला क्षेत्रो को जो कुल कर में सबसिडी दी गई है वह अक्षय उर्जा को दी गई सबसिडी की तुलना में काफी ज्यादा है। वैसे अक्षय उर्जा के क्षेत्र में सबसे बडी सबसिडी – “व्यवहार्य वित्त पोषण”, अक्षय उर्जा कि कीमतों में बढती प्रतिस्पर्धा के चलते कमी आऩे की संभावना है।

“हालांकी भारत में सौर और पवन ऊर्जा परियोजनाओं ने ग्रीड की समानता हांसिल कर ली है, लेकिन ईन स्वच्छ ऊर्जा टेक्नोलोजी को सरकार की और से बजेट से भी मदद की जरूरत है। इन में अपतटिय हवाओं (ओफशोर विन्ड), ऊर्जा संग्रह और ईलेक्ट्रिक व्हिकल्स शामिल है। इसके अलावा, एकीकृत लागत को कम करने के लिए सबसिडी संभावित रूप से अक्षय उर्जा के क्षेत्र को प्रोत्साहित कर सकती है।” – अभिनव सोमन, CEEW

अगले कुछ महिनों में भारत सरकारी योजनाएं ‘सौभाग्य’ और ‘उज्जवला योजना’ के जरिए बिजली की सार्वभौमिक पहुंच और खाना पकाने के लिए स्वच्छ ऊर्जा के उपयोग के लक्ष्य को हांसिल कर लेगा। लेकिन एक ओर जहां कनेक्शन के लिए दी जानेवाली सबसिडी में कटौती होगी, वहीं दुसरी और लाखों गरीब घरों से उर्जा सबसिडी की मांग में बढोतरी भी होगी। भारत में ऊर्जा सबसिडी की तुलना में उपभोक्ता सबसिडी वैसे भी दो तिहाई ज्यादा है। खाना पकाने की गेस और केरोसिन में दी जानेवाली सबसिडी वैश्विक तेल बाजार से जुडी हुई है। जिन गरीब लोगों को इसकी सब से ज्यादा जरूरत है उन्हें सबसिडी का लाभ पहुंचाते हुए खर्च को नियंत्रित करने के साथ लक्ष्य हांसिल करना शासन की सबसे बडी सफलता होगी।

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