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गोरखपुर लिटरेरी फेस्ट में छलका मुंशी प्रेमचंद का दर्द

मुंशी प्रेमचंद की कहानियां और उनके पात्र भले ही दशकों पहले गढ़े गए हों मगर आज भी वो हमारे मन मस्तिष्क पर अमिट छाप छोड़े हुए हैं। कहानी के पीछे उन पात्रों की कुछ अनकही वेदना व पीड़ा शेष रह जाती है जिसे शायद वो व्यक्त करना चाहते हैं। प्रेमचंद ने समाज के उपेक्षित, तिरस्कृत लोगों की संवेदना और पीड़ा को जीवंत रूप में शब्दों से व्यक्त किया जबकि इनमें से ज्यादातर उनकी कल्पना के पात्र ही थे। इसे केंद्र में रखकर निर्देशक मानवेंद्र त्रिपाठी ने खासतौर पर लिटरेरी फेस्ट के लिए एक नए नाटक के दृश्य लिखे।

रविवार को पांचवें सत्र में जब इसका मंचन हुआ तो दर्शकों की अनवरत तालियां, तारीफ  और सराहनाएं उन्हें समर्थन दे रही थीं। प्रेमचंद जी की तीन कहानियां ठाकुर का कुआं, कफन एवं ईदगाह को केंद्र में रखकर एक ऐसा दृश्य विधान रच गया जिसमें खुद प्रेमचंद बतौर एक पात्र मौजूद थे। जाहिर है कि यह नए तरह का सृजन भी था और सृजन से आगे का सवाल भी था।

धर्म तो सेतु है लेकिन मनुष्य ने उसे खाई बना डाला

जब ‘ठाकुर का कुंआ’ में नीच जाति की बुधिया को कुंए से पानी नहीं मिलने के कारण उसके पति की मौत हो जाती है।

तब वो सवाल उठाती है-

‘ये कौन सा धर्म जो एक प्यासे को प्यास बुझाने से रोके?’

तब मुंशी प्रेमचंद आते हैं और समाज से कहते हैं…

‘धर्म तो मनुष्य और ईश्वर के बीच का सेतु होता है लेकिन मनुष्य ने उसे खाई बना डाला’

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