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शब्द को यथासम्भव सम्हलकर ही बोलना चाहिए

हर शब्द को यथासम्भव सम्हलकर ही सदा बोलना चाहिए। शब्द का कोई भी मूर्त रूप नहीं होता यानी हमारी तरह उनके शरीर या हाथ-पाँव नहीं होते। इसलिए वे हम इन्सानों की तरह हाथों-पैरों से झगड़ा नहीं करते और न ही हथियार चलाकर किसी को घायल कर सकते हैं अथवा किसी की जान ले सकते हैं।
ये अशरीरी शब्द यानी शरीरधारी न होते हुए भी अपने सामने वाले को गम्भीर घाव दे जाते हैं। उन घावो की टीस आजन्म मनुष्य के मन को आहत करती रहती है। निम्न दोहे में बड़े सुन्दर शब्दों में कहा है-
मधुर वचन हैं औषधि, कटुक वचन हैं तीर।
स्रवण द्वार होई संचरे, वैधे सकल सरीर।।
अर्थात मधुर वचन औषधि की तरह होते हैं पर कड़वे वचन तीर की तरह होते हैं। सुनाई कानों से देते हैं पर सारे शरीर को बेध देते हैं।
दूसरी ओर ऐसे शब्द भी हैं जो औषधि की तरह दूसरे की चोट पर मलहम लगाते हैं और सान्त्वना देते हैं। ये मधुर वचन कल्पवृक्ष और कामधेनु के समान होते हैं जो पलक झपकते ही मनोकामनाओं को पूर्ण कर देते हैं। ये दुखी और पीड़ित व्यक्ति को कष्ट से राहत दिलाने का भरसक प्रयास करते हैं।
शब्द बहुत अमूल्य होते हैं। इनका प्रयोग करते समय सावधानी बरतनी चाहिए इसीलिए कहा है- ‘पहले तोलो फिर बोलो।’ यानी जिन शब्दों का प्रयोग करना चाहता है, बहुत सोच-समझकर उन्हें बोलना चाहिए। मनीषी कहते हैं तीर का घाव भर जाता है पर शब्दों द्वारा दिया गया घाव नहीं भरता।
इसी भाव को इस दोहे में बहुत सरल शब्दों में समझाया है-
बोली एक अमोल है जो कोई बोले आन।
हिय तराजू तौल के तव मुख बाहर आन।
अर्थात बोली या शब्द अनमोल होते हैं। उन्हें मन के तराजू में तोलकर ही अपने मुँह से बाहर निकालना चाहिए। यानी शब्दों को बैलेंस करके बोलना चाहिए, इसी में समझदारी होती है।
बिहारी कवि के दोहों की तरह ये शब्द छोटे होते हुए भी गम्भीर घाव करते हैं। जब घाव नासूर बन जाते हैं तब किसी भी मनुष्य की सहनशक्ति सीमा को पार कर जाती है जिसका परिणाम भयंकर होता है। इसी के कारण पीढ़ी-दर-पीढ़ी शत्रुता निभाई जाती है। शत्रु पक्ष को अधिकाधिक जान और माल की हानि पहुँचाने का प्रयास किया जाता है।
स्वर्ण मृग को पकड़ने गए भगवान राम की करुण पुकार का लक्ष्मण पर कोई प्रभाव न होने पर उसे भगवती सीता ने कठोर वचन कहे। फिर लाचार लक्ष्मण के प्रस्थान कर जाने के पश्चात रावण उन्हें हरकर ले गया। इसका दुष्परिणाम राम-रावण युद्ध था।
दुर्योधन को कहे गए द्रौपदी के अपशब्दों के कारण महाभारत काल में विनाश का ताण्डव हुआ। जिसे भगवान श्रीकृष्ण भी नहीं बचा सके।
अपने अधीनस्थों और छोटों के लिए भी न तो कभी व्यंग्य बाण चलाने चाहिए और न ही अपशब्द बोलने चाहिए। ऐसा करने वाले मनुष्य को तिरस्कार का सामना करना पड़ता है। समय-समय पर उनका उपहास भी किया जाता है।
इन शब्दों के मर्मभेदी बाण चलाकर मनुष्य अपने मित्रों को शत्रु बना लेता है। इसके विपरीत सद् वचनों के प्रभाव से शत्रु को भी मित्र बना लेता है। यह सब शब्दों की शक्ति है जो मनुष्य से उसका मनचाहा करवा लेती है। इसे आम भाषा में हम चाटुकारिता या चापलूसी भी कह सकते हैं। चापलूसी एकाध बार तो किसी को मोह सकती है, हमेशा नहीं।
अनावश्यक ही क्षणिक आवेश में आकर मनुष्य को कभी अनर्गल प्रलाप नहीं करना चाहिए। ऐसा करने वाले इन्सान को कहीं भी सम्मान नहीं मिलता। फिर धीरे-धीरे लोग उसके बोलने की परवाह करना छोड़ देते हैं। फिर उससे किनारा करने में परहेज नहीं करते।
स्वयं पर और अपने शब्दों पर जो संयम रखते हैं वही व्यक्ति संसार में मान्य होते हैं। यही लोग लोकप्रिय बनते हैं। हर कोई उनका साथ पाने के लिए लालायित रहता है।
– चन्द्र प्रभा सूद

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