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विवाह पद्धति भारतीय संस्कृति का मूल है

विवाह पद्धति हमारी भारतीय संस्कृति का मूल है। इसका कारण है कि विवाह के पश्चात नवयुवक और नवयुवती गृहस्थाश्रम मे प्रवेश करते हैं। यह गृहस्थाश्रम शेष तीनों आश्रमों- ब्रह्मचर्याश्रम, वानप्रस्थाश्रम और सन्यासाश्रम का पालन करता है।
हमारे शास्त्रों में आठ प्रकार के विवाह माने गए हैं- ब्राह्म, दैव, आर्ष, प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच।
ब्राह्म विवाह – भारतीय समाज में सबसे उत्तम विवाह माना जाता है। ब्रह्म विवाह में पितृपक्ष से सात पीढ़ी और मातृपक्ष की पाँच पीढ़ी में विवाह सम्बन्ध वर्जित हैं। शादी के समय कन्या का परिवार बेटी के लिए सुयोग्य वर की तलाश करता है और बेटे के लिए सुयोग्य कन्या की। दोनों परिवार के एक-दूसरे से मिलकर अपनी तसल्ली करते हैं और फिर दोनों की सहमति से विवाह तय कर दिया जाता है। इसे हम ‘अरेंज्ड मैरेज’ कह सकते हैं। इस विवाह में दोनों बच्चों की भी सहमति ली जाती है।
दैव विवाह – धार्मिक अनुष्ठान के बदले में पिता का अपनी कन्या का कन्यादान करना दैव विवाह कहलाता था।
आर्ष विवाह- ऋषि-मुनि जब गार्हस्थ जीवन जीना चाहते थे, तब कन्या के पिता को दान में गाय देते थे। कन्या पक्ष यदि गोदान स्वीकार कर लेता था तो ऋषि से कन्या की शादी हो जाती थी। कन्या पक्ष की इच्छा न होने पर ऋषि को सादर गौ वापिस कर दी जाती थी।
प्रजापत्य विवाह – प्रजापत्य विवाह में पितृपक्ष से पाँच पीढ़ी और मातृपक्ष से केवल तीन पीढ़ी तक विवाह वर्जित माने जाते है। इस विवाह में कन्या की सहमति आवश्यक नहीं मानी जाती है। कन्या पक्ष कोई भी अभिजात्य वर देखकर उससे अपनी पुत्री का विवाह तय कर देता थे।
गंधर्व विवाह – युवक एवं युवती दोनों अपने-अपने परिवार की स्वीकृति के बिना, विवाह कर लेते हैं। इसे भागकर विवाह करना भी कह सकते हैं। इसे प्रेम विवाह का नाम भी दे सकते हैं जिसमें माता-पिता की सहमति नहीं होती।
असुर विवाह – पैसे आदि का लेन-देन करके विवाह करना असुर विवाह की श्रेणी में आता है। पहले कन्या को खरीदा जाता है फिर उससे विवाह किया जाता था। पिता अपनी पुत्री का मूल्य लगाता था और इक्षित युवक उतना धन देकर कन्या से विवाह कर लेता था।
राक्षस विवाह – किसी युवती का बलात अपहरण करके, जबरदस्ती शारीरिक सम्बन्ध बनाने को राक्षस विवाह कहा जाता था। युद्ध के मैदान में विजय प्राप्त करने के बाद लड़की को जबरदस्ती घर में लाना राक्षस विवाह कहलाता है।
पिशाच विवाह – युवती की मानसिक दशा या धोखे से नशा पिलाकर शारीरिक संबंध बना लिया जाए यानी बलात्कार आदि के बाद सजा आदि से बचने के लिए उस पीड़ित युवती से विवाह किया जाए। यानी अंतिम विकल्प के रूप में विवाह कर लिया जाए। ऐसा आजकल भी होता है जो अखबारों में अक्सर पढ़ने को मिलता है।
रामायण एवं महाभारत आदि ग्रन्थों में स्वंयवर विवाह का वर्णन है। इसे विवाह के प्रकारों में नहीं लिया गया। शायद इसे ब्राह्म विवाह माना जा सकता है। इस प्रकार के विवाह में माता-पिता और कन्या सबकी सहमति होती थी।
नारद पुराण ब्रह्म विवाह को सर्वर्श्रेष्ठ मानता है। दूसरे नम्बर पर दैव विवाह को रखते हैं। आर्य विवाह को भी उत्तम माना है। प्राजापत्य, असुर, गन्धर्व, राक्षस और पिशाच विवाह को अशुभ माना है। परन्तु कुछ विद्वान प्राजापत्य विवाह को भी उचित मानते है। शुभ मुहूर्त में अग्नि को साक्षी मानकर, विधि-विधान से मन्त्रोच्चारण करके विवाह सम्पन्न कराया जाता है। इन विवाहों के समय सभी बन्धु-बान्धव उपास्थित रहते हैं।
– चन्द्र प्रभा सूद

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