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विद्यालय स्तर पर संगीत नृत्य शिक्षा

यह एक अनोखी अनदेखी घटना है। जिसकी अभिव्यक्ति हर उस मानव की है, जो संगीत रूपी समंदर के किनारे रहकर विलिन होता रहता है और सदा इच्छा रहती है, उन लौटती मौजो का साथ देने की …

जगत पिता ब्रह्मा ने सृष्टि की रचना की। हर एक छोटी-बड़ी रचना को काम दिया। हवाओं को बहना, झरनों को झरझर गिरना, नदियों को कल-कल बहना, कलियों को खिलना दिया और तब इससे जन्म हुआ कला का। यह कला थी संगीत की। सूरज की पहली आभा से दूर छटा अंधेरा और प्रकृति चाहती है, उसे देखना। झरनों ने झन-झन की रागिनी छेड़ दी। भंवरो की गुनगुन चिड़ियों की चहचहाहट से गीतिका बनी, तितललियाँ फूलांे पर थिरकने लगी। प्रकृति खुश हो उठी अपने इस रूप को देखकर जिसमें –

लय और ताल के साथ

सुर भी है,

कहते है जिसे फूल उसमें

सुरभि है।

इन्द्रधनुषि रंग के साथ

पराग भी है,

कलियों पे गुँजाते भंवरे जिसमें

राग भी है ।।

प्रकृति की उत्पति से ही संगीत की उत्पति को जोड़ते हैं, परंतु भारत में नृत्य की परम्परा कब प्रारंभ हुई इस विषय में कोई निश्चित तिथि बतलाना कठिन है। किन्तु इतना तो निःसंदेह कहा जा सकता है कि यह अत्यंत प्राचीन काल से विद्यमान रही है। उत्खनन से प्राप्त मोहनजोदड़ों कालिन नृत्यांगना की कांस्य-प्रतिमा भारत में नृत्य कला की प्राचीनता को निर्विवाद रूप से प्रमाणित करती है। मौर्यकालीन साहित्य एवं अन्य साक्ष्यों से तत्कालिन समाज में नृत्य कला की परम्परा का ज्ञान होता है। इस काल में इस कला का सर्वाधिक प्रचलन गणिकाओं की बीच था। इससे पहले यह कला मंदिरो की शोभा हुआ करती थी।

धीरे-धीरे यह मंदिरों से उठकर राजमहल की शोभा बन गई। मुगलों का प्रभाव इतना पड़ा की जहाँ कृष्ण-राम आदि देवी-देवताओं की स्तुति और गाथाये होती थी, अब साथ-साथ झुक-झुक कर सलाम करने की प्रथा बन गई। मुसलमानी प्रभाव ने नजाकत के साथ कड़े नियम भी हो गये। सभा को मनोरंजन करना एक उद्देश्य हो गया। इस प्रकार से कई बारिकियों पर ध्यान गया। यह प्रभाव कथक नृत्य और उत्तरभारतीय संगीत पर अधिक देखने को मिलती हैं। वहीं दक्षिण भारतीय योग और अध्यात्म से जूडे़ रहे।

शायद इसलिए उत्तरीभारतीय नृत्य संगीत इतने लोक प्रिय हो गये क्योंकि उसमें शास्त्रीयता के साथ कई अन्य आयाम जोड़ा जाने लगा और वह अधिक लोक रंजक बना। यही कारण है कि आर हिन्दी फिल्म जगत में उत्तरभारतीय नृत्य-संगीत छाया हुआ है।

ये अच्छी बात है । नृत्य संगीत ना केवल मंदिरो मे और ना ही समाज के खास को विशेष की विषय वस्तु रही। बल्कि हर एक जन-मानस की पंसद के साथ आत्मसात करने विशेषता बनने लगी।

चलते-चलते हम आज के कलयुग में आ गये। संगीत का सफर तब भी हसीन या और आज भी रूहानी है। बस जरूरत है हम उसे आज के परिवेश मे कैसे प्रयोग में लाय और बेहतरीन रूप में उपयोग करें।

स्कूली स्तर पर नृत्य संगीत को शैक्षणिक व्यवस्था में रखने का तात्पर्य ये है कि शिक्षार्थियों को इस बात की मान्यता मिल जाय कि वह बुनियादी शिक्षा ;इंेपब मकनबंजपवदद्ध की तरह कला को भी शिक्षा के रूप में अपना सके। इस प्रकार से शिक्षार्थियों के अपने अंदर की क्षमता जैसे विचार, अनुभव, विचारो को नृत्य-संगीत के माध्यम से सहज रूप से विचार का आदान-प्रदान (संवाद) कर सके। इस अर्थ ने कि संगीत ऐसे तथ्यों से जूड़ा हो जिससे उनकी योग्यता उनके किसी भी प्रकार के चमतवितउंदबम ेजंजने बढ़े और आस-पास के क्षेत्रों में वो प्रभूउत्य है ऐसा महसूस करें। इससे हम उनके बवदपिकमदबम समअमस को बढ़ाते है, साथ ही व्यक्तिव विकास मंे सहायता करते है। इस लिए शिक्षकों को ऐसे विधि का आविष्कार करने चाहिए ओर उन्हें प्रयोग भी करना चाहिए। जिससे उनके जीवन जगत को अनुशासन को बढ़ावा मिलता है।

नृत्य-संगीत को शारीरिक शिक्षा के रूप में लेने से शारीरिक क्षमता का भी विकास होता है। हम बखुबि योग, मार्शल आर्ट और व्यायाम को नृत्य से संगत कर सकते है। इसके महत्वों को मैने अपने आस-पास और खुद में भलीभातिं महसूस किया है। प्रिया अभी नौ वर्ष की तीसरी कक्षा की छात्रा है। मैनें गजब का उसमें एकाग्रता, अवलोकन और भावाभिव्यक्ति देखी है। वह छोटी लड़की कत्थक और चित्रकला में रूचि रखती है और बड़ी तनमयता से सारे काम पढ़ाई-लिखाई भी करती है। उसमें सीखने की ललक है। यह एक मात्र नहीं जिसकी मैं बात कर रही मेरे सामने ऐसे कई बच्चे है जिनमें मैं ये गुण देख पाती हूँ ।

अपे बातो को, विचार को सहज और स्वभाविक रूप से प्रस्तुत करना। किसी भी तथ्य पर आलोचनात्म और रचनात्मक सोच रखना ।

विशेष तौर पर यह बताने की जरूरत नहीं फिर भी ये ऐसा इस कारण होता है कि बच्चे जब समुह में तालिम लेते है। ऐसे में पूरा ध्यान रखना होता है कि एक एक हरकत, ताल, सुर बोल पर ध्यान रखे। सर्तक रहना बहुत जरूरी होता हैं। वे ये सीखते है कि एक गलती सभी की मेहनत पर पानी फेर सकता है। इसलिए बारीकी से सुनते है और अपना सर्वश्रेष्ठ प्रस्तुत करनी की आदत उनमें शामिल हो जाती है।

नृत्य-संगीत समुह में काम करे के महत्व और सहयोग की प्रकृति के रूप में जन्म लेता है। ये बच्चे जब भी मेरे बागीचे मे खेलने आते मैं इनकी बातो को सुनने मंे और उनसे बाते करने में बड़ी दिलस्पी रखती हूँ। उन लोगों ने पूरे दिन क्या-क्या किा ये पुछती हँू। उन सब में स्नेह बड़ी वाचाल है पर अपनी बातें सजा-सजा कर बड़े हीं कायदे से पेश करती है। बोलने की ये कला, स्नेहा के पूरे जीवन में रहेगी। आर्यन चंचल है, पर हमेशा मैनें देखा है कि वह तितलीयों और फूलों को निहारने के लिए रूक जाता है। उसे खेल के नियम खुद बनाते देखती हूँ और उसे बड़े अनुशासित रूप में सबों को पालन करने को कहता भी है। आर्यन एक कलाकार है उसे पता है किस तरह से समुह को संचालित करना चाहिए। अपने प्रभुत्व की भावना साथ खेलने वाले सभी साथियों के उप एक समान बनाकर रखता है और एकता स्थपित करता है।

नृत्य-संगीत कला सीखने वाले बच्चों के बौधिक स्तर उच्च होते है। सामान्य ज्ञान और व्यवहार अच्छे होते है। बड़ो का आदर, छोटो को प्यार या कहे एक स्वस्थ सामाजिक प्राणी बनते है। अपनी खुद की एक पहचान बनाते है।

अब मैं अपने बागिचें से निकलकर असली मुद्दे पर आती हूँ। क्योंकि इन सब बातों का महत्ता तभी बनी रहेगी जब हमारे स्कूल में कक्षा का माहौल आनन्द से भरा और उत्सव पूर्ण हो। स्कूलों में नृत्य-संगीत के तकनिक, नृत्यकला, उनके इतिहास, लोक नृत्य संगीत पर ध्यान दिया जाय साथ ही समय समय पर उनका मंचन, कार्यशाला, प्रदर्शनी करवानी चाहिए।

आइये थोड़ा विचार करे, हमारा वातावरण कैसा हो जो स्कूलों में नृत्य-संगीत की शिक्षा में सहायक हो सके।

खूला वातावरण, आईना, लकड़ी का चिकना फर्श हो । जितना ध्यान नृत्य-संगीत के तरीके और अंदाज में होना चाहिए उतना उसके मौलिक तकनीकों के तालाश और शास्त्रीय ज्ञान में ध्यान हो। सामाजिक अध्ययन के रूप् में सांस्कृतिक नृत्य-संगीत नाट्य अभिनय को प्रयोग में लाया जाय।

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कला को समाज में सीधे-सीधे ऐसे प्रस्तुत या प्रसार करना चाहिए कि सभी को उससे प्यार हो और आत्मसात करें। तब ही हम समाज को स्वस्थ्य जन और स्वस्थ्य कला का जन्म दे सकेगें। हमें पता है, सारे अभिभावन ये नहीं चाहते की उनके बच्चे नर्तक, गीतकार, संगीतकार आदि बने। बल्कि ऐसे कुछ ही अभिभावक होगें। हमें बहुत से पेशेवर नृत्यकार, संगीतकार आदि नहीं चाहिए पर स्कूली शिक्षार्थियों से आशा जरूर होनी चाहिए कि सभी शिक्षार्थि नृत्य-संगीत कला को देखे, समझे और सराहे।

फिर उन्हें अपने जीवन में प्रकृति की सुन्दर छटा नजर आयेगी। पवन की गुनगुनाहट सुनाई देगी। समुद्र के तेज लहरों सी थिरकन होगी और फिर इतने मुग्ध हो जायेगे मानों बेचैन भागती लहरें रेत में विलिन हो जाती है। और हम तृप्त हो जाते हैं नम हो जाते है। संतृप्ति की इच्छा आजीवन बनी रहती है, और आज फिर उन लौटती मौजो को साथ देने को जी चाह रहा है जो संगीत की गहराइयों में डूबता और उसका किनारा पाता है।

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