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इस दीपावली पर हमें आत्ममंथन करना है!

हम बड़े धूम-धाम से दीपोत्सव मनाने की तैयारी कर रहे हैं। दीपावली का यह त्योहार हम सब पारंपरिक तरीके से और बहुत ही उत्साह से मनाते हैं।
दीपावली के दिन सभी अपने-अपने घरों में दीपमाला करते हैं। आजकल देखा-देखी होड़ होने लगी है। लोग घर पर इतनी सुन्दर लाइटिंग करने लगे हैं कि मन बरबस उसे देखने के लिए लालायित हो जाता है। गरीब-से-गरीब व्यक्ति भी अपने घर दो-चार दिए तो जला ही लेते हैं।
भगवान राम भगवती सीता और छोटे भाई लक्ष्मण के साथ चौदह वर्ष के वनवास के पश्चात आततायी रावण के अत्याचार से जन सामान्य को मुक्त करके इस दिन अयोध्या वापिस लौटे थे। उनके आगमन की खुशी में अयोध्यावासियों ने दीपमाला जलाकर अमावस्या की रात को प्रकाशित करके उनका स्वागत किया था।  प्रसन्नता व उत्साह का प्रतीक यह पर्व आज भी उसी उल्लास व खुशी से मनाया जाता है।
माँ लक्ष्मी की प्रतीक्षा में पलक पाँवड़े बिछाए लोग अपने-अपने घरों और कार्यालयों में सफाई अभियान चलाते हैं। दीपकों के प्रकाश से माँ लक्ष्मी का मार्ग प्रशस्त करते हैं। ऐसी धारणा है कि देवी लक्ष्मी इस दिन पृथ्वी लोक पर विचरण करती हुई लोगों को मनचाहा वरदान देती हैं और मुक्त हस्त से धन-दौलत बाँटती है।
भारतीय संस्कृति में दीपावली से नव वर्ष का आरम्भ माना जाता है। इसीलिए दुकानदार अपने बही-खाते इसी दिन से आरम्भ करते थे।
पूरा वर्ष हम इस दिन की बेसब्री से प्रतीक्षा करते हैं। बच्चे तो कई दिन पूर्व से ही योजनाएँ बनाने में जुट जाते हैं। उनके लिए दीपावली का अर्थ होता है नए कपड़े और मनपसंद नया खिलौने खरीदना। दीपावली से कुछ दिन पूर्व से ही बच्चे तरह-तरह के पटाखे चलाने लगते हैं। उसी से ही उनका उल्लास झलकता है।
चारों ओर सजे बाजार और ग्राहकों की आवाजाही पर्व के महत्त्व में चार चाँद लगा देते हैं। अपने ग्राहकों को आकर्षित करने के लिए सेल का लालच देते हैं। कहते हैं इस पर्व पर दुकानदार सालभर के खर्च का एक बड़ा हिस्सा कमा लेते हैं। जो जितना अधिक ग्राहकों को आकर्षित कर पाता है उतना ही कमा लेता है।
मित्रों, संबधियों और आस-पड़ोस के साथ उपहारों का आदान-प्रदान करके हम त्योहार की गरिमा बढ़ाते हैं। इसी बहाने सबसे मिलना-जुलना भी हो जाता है। यही मेल-मिलाप रिश्तों की डोर को और अधिक मजबूत करने में सहायक बनता है।
कुछ लोग शराब आदि का नशा भी करते हैं और त्योहार पर बदमजगी करते हैं। इससे बचना चाहिए। कुछ लोग जुआ खेलकर सोचते हैं कि माँ लक्ष्मी की उन पर कृपा हो जाएगी। उन लोगों की यह सोच बिल्कुल गलत है। यह जुए की लत बरबाद करने वाली होती है जो सड़क पर लाकर खड़ा कर देती है।
महाभारत से बड़ा उदाहरण क्या हो सकता है जहाँ धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर पाँचों भाइयों और पत्नी द्रौपदी सहित अपना राजपाट जुए में हारकर कंगाल बन गए थे। उस समय उन्हें लाक्षागृह, अज्ञातवास जैसे भीषण संकटों का सामना करना पड़ा था।
त्योहार की सात्विकता बनाए रखना हम सभी का कर्त्तव्य है। हमारा यत्न यही होना चाहिए कि सबकी भलाई के लिए जन जागरण करते रहें।
इस दीपावली पर हमें आत्ममंथन करना है। आने वाले नये वर्ष के लिए हमें एक सकारात्मक व सार्थक योजना बनानी है जिससे आने वाला 2016 हमारे लिए नयी खुशियाँ ला सके। हमने जो-जो योजनाएँ पिछले वर्ष बनायी थीं उनके विषय में भी विचार करना कि उन्हें हम कितना पूरा कर पाए। जो योजनाएँ पूरी हो गईं हैं तो उसके लिए अपनी पीठ थपथपा लीजिए परन्तु जो योजनाएँ कारणवश पूर्ण नहीं हो पायीं है उन पर मनन करना आवश्यक है। हमारा यत्न यही होना चाहिए कि उन्हें अविलम्ब पूरा करके आगे बनाई योजनाओं के लिए कमर कसकर जुट जाएँ। यदि हम इस प्रकार कर पाते हैं तो अपने जीवन की गाड़ी को सहजता से चला सकते हैं अन्यथा घसीटते हुए थक-हार जाते हैं।
ईश्वर से यही प्रार्थना है कि आप सभी की मनोकामनाओं को पूर्ण करे और सबके जीवन को इन्द्रधनुषी रंगों से सराबोर करे। आशा है ईश्वर की कृपा आप सब पर पूरा वर्ष बनी रहेगी।

– चन्द्र प्रभा सूद

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